"उबटन" By Aditya Singh
मुझे आज भी याद है कि हमारे कॉलोनी में होली का रंग सप्ताहभर पहले ही बिखरने लगता था। खेल-खेल में दोस्तों को रंग-गुलाल लगा देना या फिर चुपके से पिचकारी भरकर उन पर पानी फेंक देना, हमारा प्रिय मनोरंजन हुआ करता था। इसी बीच, होलिका दहन की तैयारी भी शुरू हो जाती थी, लकड़ियाँ और गोबर के उपले इकट्ठा करने का सिलसिला चलता रहता था।
समय के साथ हम बड़े हुए, तो रंग खेलने का समय थोड़ा सीमित हो गया, लेकिन परंपराएँ जारी रहीं। अब हम चंदा इकट्ठा करके लकड़ियाँ और उपले खरीदने लगे। मुझे याद है कि होली के एक दिन पहले, यानी होलिका दहन की संध्या को, घर में गुजिया और ठेकुआ बनाए जाते थे। लेकिन उससे पहले एक और रस्म होती थी, उबटन लगाने की। माँ सुबह ही सरसों का उबटन पीसकर रख देती थीं और शाम होते ही पिताजी, भइया, दीदी और हम सब बारी-बारी से उसे लगाते थे। उबटन से निकली मैल को एक पन्नी में इकट्ठा कर रात में होलिका में डाल दिया जाता था। मान्यता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।
अब, भइया और दीदी की शादी के बाद, वे अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए हैं और त्योहारों पर ही घर आ पाते हैं, कभी-कभी तो वह भी संभव नहीं हो पाता। धीरे-धीरे कॉलोनी में होलिका जलना भी बंद हो गया, क्योंकि लोग अब होली फोन पर मनाना ज्यादा पसंद करने लगे हैं, बजाय एक-दूसरे से मिलकर। मुझे लगता है कि माँ के बाद घर में उबटन लगाने की परंपरा भी समाप्त हो जाएगी।
इन सबके बावजूद, मुझे अब भी उम्मीद है कि एक दिन फिर से हमारी कॉलोनी में होलिका जलेगी और हम सभी होली का त्योहार उसी उत्साह से मनाएंगे, जैसे बचपन में मनाया करते थे।
आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ!
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