“अरे बेटा! और आजकल क्या कर रहे हो?” By Aditya Singh
गाँव की गलियों में सुबह का धुआँ अभी पूरी तरह छँटा नहीं था, चाय की दुकानों पर बेंचें लोगो से भरी हुई थी, लोग अख़बार के पन्नों से ज़्यादा एक-दूसरे की ख़बरों में दिलचस्पी ले रहे थे। ऐसे ही माहौल में, जब कोई नौजवान गली से गुजरता है तो किसी न किसी मोड़ से एक आवाज़ आती है,
“अरे
बेटा!
और
आजकल
क्या
कर
रहे
हो?”
सवाल छोटा है, लेकिन असर गहरा।
यह
सवाल
जैसे
हल्केपन में
पूछा
जाता
है,
पर
सुनने
वाले
के
दिल
में
किसी
काँटे
की
तरह
चुभ
जाता
है।
हर
नौजवान
के
लिए
यह
सवाल
उसकी
अधूरी
कोशिशों, टलते
सपनों
और
समाज
की
उम्मीदों की
याद
दिला
देता
है।
जिस
उम्र
में
वह
खुद
को
समझने,
दिशा
तय
करने
और
ठोकरों
से
कुछ
सीखने
की
कोशिश
कर
रहा
होता
है,
उसी
समय
यह
सवाल
उसे
उसके
‘कुछ ना
करने’
की
याद
दिला
देता
है।
कुछ
नौजवान
ऐसे
हैं
जो
अपने
घरों
से
बहुत
दूर,
किसी
छोटे
कमरे
में,
किसी
पराये
शहर
में
रहकर
अपने
सपनों
की
तैयारी
में
जुटे
हैं।
उनके
कमरे
की
दीवारों पर
नोट्स
चिपके
हैं,
टेबल
पर
किताबें खुली
रहती
हैं,
और
अंदर
एक
बेचैन
उम्मीद
सुलगती
रहती
है
कि एक
दिन
कुछ
बन
जाएंगे,
एक
दिन
घर
गर्व
से
सिर
उठाएगा।
लेकिन
जब
वह
घर
लौटने
की
सोचते
हैं,
तो
मन
में
डर
का
एक
साया
आता
है
“लोग फिर वही पूछेंगे , और आजकल क्या कर रहे हो?”
इस
सवाल
से
बचने
के
लिए
कितने
नौजवान
घर
से
दूर
रहना
चुन
लेते
हैं।
वे
त्यौहारों पर
नहीं
लौटते,
न
किसी
शादी-ब्याह में दिखते
हैं।
उनके
माता-पिता दरवाज़े पर
खड़े
होकर
राह
देखते
हैं,
पर
वे
लौटते
नहीं,
क्योंकि उन्हें
डर
होता
है
कि
मोहल्ले की
नज़रों
में
वे
अब
भी
‘कुछ
नहीं
कर
रहे’।
धीरे-धीरे वे अपने
ही
घर
में
पराये
हो
जाते
हैं।
समाज
यह
नहीं
समझता
कि
हर
राह
की
अपनी
दूरी
होती
है,
हर
मंज़िल
का
अपना
समय।
किसी
का
सफर
जल्दी
खत्म
होता
है,
किसी
का
देर
से
लेकिन हर
कोई
अपनी
पूरी
कोशिश
में
लगा
रहता
है।
पर
जब
हम
किसी
की
मेहनत
को
नहीं,
केवल
नतीजे
को
मापते
हैं,
तब
यह
निर्दोष-सा
दिखने
वाला
सवाल
एक
बोझ
बन
जाता
है।
यह
सवाल
धीरे-धीरे आत्मसम्मान को
खा
जाता
है,
और
मन
में
यह
डर
भर
देता
है
कि
दुनिया
हमें
तब
तक
नहीं
स्वीकारेगी, जब
तक
हमारे
पास
कोई
“उपलब्धि” न
हो।
कई
बार
यह
सवाल
किसी
युवक
को
उस
जगह
पहुँचा
देता
है
जहाँ
वह
खुद
से
बात
करना
भी
छोड़
देता
है।
वह
मुस्कुराना भूल
जाता
है,
दोस्तों से
कट
जाता
है,
और
भीतर
ही
भीतर
टूटने
लगता
है।
उसे
नहीं
चाहिए
किसी
से
सहानुभूति, बस
चाहिए
समझ
,कि
कोशिश
करना
भी
एक
काम
है,
और
असफल
होना
भी
जीवन
का
हिस्सा
है।
अब
वक़्त
है
कि
हम
अपने
सवाल
बदलें।
किसी
से
“और
आजकल
क्या
कर
रहे
हो”
पूछने
से
पहले
एक
बार
सोचें
कि
इस
सवाल
के
पीछे
हमारे
अपने
समाज
की
अधीरता
छिपी
है।
क्यों
न
हम
यह
पूछें
“कैसे
हो?”
“खुश
हो?”
“कुछ
नया
सीख
रहे
हो?”
कभी-कभी समाज को
बदलने
के
लिए
कोई
क्रांति नहीं
चाहिए,
बस
एक
सवाल
बदल
देना
काफ़ी
होता
है।
Comments
Post a Comment