"आदर्शों का बोझ और खोती हुई पहचान" By Aditya Singh

भारत में, ख़ासकर के उत्तर भारत में, बचपन से ही बच्चों को उनके माता-पिता, रिश्तेदारों और समाज द्वारा यह सिखाया जाता है कि "बेटा, तुम्हें इनकी तरह बनना है," या "तुम्हें इनके जैसा नहीं बनना है।"

यानी बच्चे के जीवन की दिशा तय करने का अधिकार शुरुआत से ही उसके अपने हाथों में नहीं होता। समाज पहले ही यह ठहरा देता है कि कौन-सा रास्ता "सही" है और कौन-सा "गलत"।

कभी मोहल्ले के पढ़ाई में अव्वल बच्चे की मिसाल दी जाती है, तो कभी किसी रिश्तेदार की जो सरकारी नौकरी पा चुका है। बच्चों के भीतर यह भाव घर करने लगता है कि जब तक वे किसी और जैसे नहीं बन जाते, तब तक समाज में उन्हें कोई महत्व नहीं मिलेगा।

इस अंतहीन तुलना और अपेक्षाओं की दौड़ में एक बच्चा अपने मूल स्वभाव, अपनी इच्छाओं, अपनी सोच सब कुछ दबाकर किसी और की तरह बनने की कोशिश करता है। लेकिन न वो पूरी तरह कोई और बन पाता है, और न ही अपने आप को स्वीकार कर पाता है। फलस्वरूप वह जीवनभर आत्मग्लानि, अपराधबोध और असंतोष से घिरा रहता है।

किसी ने कभी यह प्रश्न ही नहीं उठाया कि "आख़िर वह बच्चा स्वयं क्या बनना चाहता है?" परिवार और समाज ने अपनी अधूरी इच्छाओं का बोझ बच्चों पर लाद दिया मानो बच्चे उनका 'ड्रीम प्रोजेक्ट' हों।

और जब कोई बच्चा इन थोपे हुए आदर्शों को मानने से इनकार करता है, और खुद की राह चुनता है, तो उसे “बिगड़ा हुआ”, “असभ्य”, या “जिद्दी” कहा जाने लगता है।

छोटी उम्र में ही बच्चे झूठ बोलना, अभिनय करना, और अपने मन की बात छिपाना सीख जाते हैं ताकि वे समाज की स्वीकृति पा सकें। वे अपने असली चेहरे के ऊपर एक मुखौटा पहन लेते हैं, और धीरे-धीरे वही मुखौटा उनकी पहचान बन जाता है।

अब समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि आदर्श थोपे नहीं जा सकते, वे खोजे और जिए जाते हैं।

हर बच्चे का स्वभाव, उसकी रुचि, उसकी क्षमता अलग होती है और उसी में उसका भविष्य छिपा होता है। जब तक हम उसे खुद को जानने और गढ़ने का अवसर नहीं देंगे, तब तक कोई भी आदर्श समाज बन ही नहीं सकता।

इसी सोच को आधार बनाकर, हम झारखंड के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के बीच ‘सामाजिक-भावनात्मक शिक्षण’ के ज़रिए स्वयं को खोजने की जिज्ञासा का निर्माण कर रहे हैं ताकि वे यह समझ सकें कि उनकी असली पहचान किसी और की नकल में नहीं, बल्कि उनके भीतर है।

अब ज़रूरत है कि हम बच्चों को यह कहें "बेटा, तुम्हें किसी और की तरह नहीं अपने जैसा बनना है।"

क्योंकि पहचान किसी और जैसे बनने में नहीं, बल्कि खुद के जैसा होने में है

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